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श्लोक 4.12.13  |
एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा
यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शना:।
अज्ञातचर्यां व्यचरन् समाहिता:
समुद्रनेमीपतयोऽतिदु:खिता:॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| जिनकी दृष्टि अच्युत है, वे पाण्डव अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार मत्स्य देश में रहने लगे और एकाग्रचित्त होकर वनवास का समय व्यतीत करने लगे। समुद्र से घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वी के अधिपति होने पर भी वे बहुत कष्ट सह रहे थे॥13॥ |
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| The Pandavas, whose vision is infallible, started living in Matsya country in accordance with their vows and spent their time in exile with concentration. They were suffering a lot of hardships even though they were the rulers of the entire earth surrounded by the ocean.॥ 13॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि नकुलप्रवेशे द्वादशोऽध्याय:॥ १२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नकुलप्रवेशसम्बन्धी बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं।) |
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