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श्लोक 4.12.1  |
वैशम्पायन उवाच
अथापरोऽदृश्यत पाण्डव: प्रभु-
र्विराटराजं तरसा समेयिवान्।
तमापतन्तं ददृशे पृथग्जनो
विमुक्तमभ्रादिव सूर्यमण्डलम्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात पाण्डुपुत्र नकुल भी बड़ी तेजी से चलते हुए राजा विराट के घर आये। साधारण लोगों ने उन्हें आते देखा; उस समय वे बादलों के पीछे से निकलते हुए सूर्य के समान तेजस्वी दिखाई दे रहे थे॥1॥ |
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| Vaishmpayana says - O King! Thereafter the other powerful son of Pandu, Nakul, came walking very fast to the residence of King Virat. Ordinary people saw him coming; at that time he appeared as radiant as the Sun emerging from behind the clouds.॥ 1॥ |
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