श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.97.6 
न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमर्हसि।
प्रयच्छ मामगस्त्याय त्राह्यात्मानं मया पित:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
‘राजन्! आप मुझ पर दुःख न करें। पिताश्री! आप मुझे अगस्त्यजी की सेवा में दे दें और मेरे द्वारा अपनी रक्षा करें।’॥6॥
 
‘King! You should not feel sorry for me. Father! Please give me to the service of Agastyaji and protect yourself through me.'॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)