श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.97.19 
अन्यथा नोपतिष्ठेयं चीरकाषायवासिनी।
नैवापवित्रो विप्रर्षे भूषणोऽयं कथंचन॥ १९॥
 
 
अनुवाद
अन्यथा मैं इस जीर्ण-शीर्ण गेरुआ वस्त्र को धारण करके आपके साथ समागम नहीं करूँगा। हे ब्रह्मर्षि! तपस्वियों का यह पवित्र आभूषण किसी भी प्रकार के समागम आदि से अपवित्र नहीं होना चाहिए।॥19॥
 
‘Otherwise I will not have intercourse with you wearing this worn-out saffron garment. O Brahmarshi! This sacred ornament of ascetics should not be defiled by any kind of intercourse etc.'॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)