श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.97.12 
सा प्रीता बहुमानाच्च पतिं पर्यचरत् तदा।
अगस्त्यश्च परां प्रीतिं भार्यायामचरत् प्रभु:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
लोपामुद्रा बड़े आनन्द और विशेष आदर के साथ अपने पति की सेवा करने लगी। महाबली अगस्त्य ऋषि भी अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे॥12॥
 
Lopamudra started serving her husband with great joy and special respect. The powerful sage Agastya also loved his wife very much.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)