vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 96: इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना
»
श्लोक 2
श्लोक
3.96.2
तत्रैव लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वर:।
अगस्त्येनेह वातापि: किमर्थमुपशामित:॥ २॥
अनुवाद
उसी समय वक्ताओं में श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने महर्षि लोमश से पूछा - 'ब्रह्मन्! अगस्त्यजी ने यहाँ वातपिको का विनाश क्यों किया?'॥2॥
At the same time, King Yudhishthir, the best among speakers, asked Maharishi Lomsha - 'Brahman! Why did Agastyaji destroy Vatapiko here? 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×