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mahabharat 3.95.13-14h: उस तीर्थ में पिनाकपाणि भगवान महादेव नित्य निवास करते हैं। वहाँ उन दिनों वीर पाण्डवों ने चातुर्मास्य व्रत धारण करके महान ऋषियज्ञ अर्थात् वेदों और सत्य शास्त्रों के स्वाध्याय द्वारा भगवान की आराधना की थी। वहाँ महान अक्षयवट है। 13 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  3.95.13-14h 
यत्र संनिहितो नित्यं महादेव: पिनाकधृक्।
तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे॥ १३॥
ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान्।
 
 
अनुवाद
उस तीर्थ में पिनाकपाणि भगवान महादेव नित्य निवास करते हैं। वहाँ उन दिनों वीर पाण्डवों ने चातुर्मास्य व्रत धारण करके महान ऋषियज्ञ अर्थात् वेदों और सत्य शास्त्रों के स्वाध्याय द्वारा भगवान की आराधना की थी। वहाँ महान अक्षयवट है। 13 1/2॥
 
Pinakpani Lord Mahadev resides daily in that pilgrimage. There, in those days, the brave Pandavas took Chaturmasya vow and worshiped God through the great Rishi Yagya i.e. self-study of Vedas and true scriptures. There is great Akshayavat there. 13 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)