श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 93: ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.93.5 
भवतो भ्रातर: शूरा धनुर्धरवरा: सदा।
भवद्भि: पालिता: शूरैर्गच्छामो वयमप्युत॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'आपके भाई वीर योद्धा हैं और सदैव उत्तम धनुष धारण करते हैं। आप जैसे योद्धाओं की रक्षा से हम भी उन तीर्थस्थानों की तीर्थयात्रा पूर्ण कर सकेंगे।॥5॥
 
'Your brothers are valiant warriors and always carry the best bows. Protected by warriors like you, we too will be able to complete our pilgrimage to those holy places.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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