श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 88: धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.88.4 
राजर्षेस्तस्य च सरिन्नृगस्य भरतर्षभ।
रम्यतीर्था बहुजला पयोष्णी द्विजसेविता॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंशी रत्न! राजा नृग की पयोष्णी नदी भी वहीं है, जो सुन्दर तीर्थों और अथाह जल से सुशोभित है। ब्राह्मण उसका सेवन करते हैं॥4॥
 
O jewel of the Bharat clan! King Nrig's river Payoshni is also there, which is adorned with beautiful pilgrimage sites and unfathomable water. The Brahmins use it. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)