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mahabharat 3.87.27-28: महाराज! मैंने पूर्व दिशा में स्थित अनेक तीर्थस्थानों, नदियों, पर्वतों और पवित्र देवालयों आदि का आपसे (संक्षेप में) वर्णन किया है। अब मैं शेष तीन दिशाओं में स्थित नदियों, पर्वतों और पवित्र स्थानों का वर्णन करूँगा, सुनिए।॥27-28॥   |   mahabharat अध्याय 3.87: धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 87: धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  3.87.27-28 
तीर्थानि सरित: शैला: पुण्यान्यायतनानि च॥ २७॥
प्राच्यां दिशि महाराज कीर्तितानि मया तव।
तिसृष्वन्यानि पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु।
सरित: पर्वतांश्चैव पुण्यान्यायतनानि च॥ २८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! मैंने पूर्व दिशा में स्थित अनेक तीर्थस्थानों, नदियों, पर्वतों और पवित्र देवालयों आदि का आपसे (संक्षेप में) वर्णन किया है। अब मैं शेष तीन दिशाओं में स्थित नदियों, पर्वतों और पवित्र स्थानों का वर्णन करूँगा, सुनिए।॥27-28॥
 
‘Maharaj! I have (briefly) described to you the many pilgrimage places, rivers, mountains and holy temples etc. in the east. Now I will describe the rivers, mountains and holy places in the remaining three directions, listen.’॥ 27-28॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां सप्ताशीतितमोऽध्याय:॥ ८७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८७॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)