vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य
»
श्लोक 94
श्लोक
3.85.94
यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गाया: स्पृशते जलम्।
तावत् स पुरुषो राजन् स्वर्गलोके महीयते॥ ९४॥
अनुवाद
राजन! जब तक किसी मनुष्य की हड्डी गंगाजल का स्पर्श करती है, तब तक वह मनुष्य स्वर्ग में पूजित होता है॥94॥
Rajan! As long as a man's bone touches the water of Ganga, that man is worshiped in heaven. 94॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas