श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.85.8 
शोणस्य ज्योतिरथ्याया: संगमे नियत: शुचि:।
तर्पयित्वा पितॄृन् देवानग्निष्टोमफलं लभेत्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यदि शुद्ध एवं संयमी मनुष्य शोण और ज्योतिर्थ्य के संगम पर स्नान करके देवताओं और पितरों को तर्पण करता है, तो उसे अग्निष्टोमय यज्ञ का फल प्राप्त होता है ॥8॥
 
If a pure and self-controlled man, after bathing at the confluence of the Shona and the Jyotirthya, offers oblations to the gods and forefathers, he attains the fruits of the Agnishtomaya Yagna. ॥ 8॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas