| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य » श्लोक 67-69h |
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| | | | श्लोक 3.85.67-69h  | ततो मुञ्जवटं गच्छेत् स्थानं देवस्य धीमत:॥ ६७॥
अभिगम्य महादेवमभिवाद्य च भारत।
प्रदक्षिणमुपावृत्य गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ ६८॥
तस्मिंस्तीर्थे तु जाह्नव्यां स्नात्वा पापै: प्रमुच्यते। | | | | | | अनुवाद | | तत्पश्चात तीर्थयात्री को परम बुद्धिमान महादेवजी के मुंजवत् नामक तीर्थस्थान पर जाना चाहिए। भरतनंदन! उस तीर्थस्थान में महादेवजी के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके तथा उनकी परिक्रमा करके मनुष्य गणपति पद को प्राप्त करता है। उक्त तीर्थस्थान पर जाकर गंगाजी में स्नान करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। 67-68 1/2॥ | | | | After that the pilgrim should go to the pilgrimage site of the most intelligent Mahadevji named Munjavat. Bharatnandan! By going to Mahadevji in that pilgrimage place and paying obeisance to him and circumambulating it, a person attains the status of Ganapati. By going to the said pilgrimage and taking bath in the Ganga, a person gets rid of all sins. 67-68 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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