श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 58-59
 
 
श्लोक  3.85.58-59 
ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूटे विशाम्पते।
मन्दाकिनीं समासाद्य सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ ५८॥
तत्राभिषेकं कुर्वाण: पितृदेवार्चने रत:।
अश्वमेधमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
राजा! तत्पश्चात् मनुष्य को पर्वतों में श्रेष्ठ चित्रकूट में समस्त पापों का नाश करने वाली मंदाकिनी के तट पर पहुँचकर उसमें स्नान करना चाहिए तथा देवताओं और पितरों का पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है और वह परम मोक्ष को प्राप्त होता है। ॥58-59॥
 
King! Thereafter, one should reach the bank of Mandakini, the destroyer of all sins, at Chitrakoot, the best of mountains, take a bath in it and engage himself in the worship of the gods and forefathers. By doing this, he gets the fruits of performing Ashwamedha Yagna and attains the ultimate salvation. ॥ 58-59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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