श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.85.48 
ओङ्कारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह।
येन यत् पूर्वमभ्यस्तं तत् सर्वं समुपस्थितम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
ओंकार का नियमानुसार सही उच्चारण करने पर व्यक्ति को पूर्वकाल में पढ़े हुए तथा आचरण किये हुए सभी वेद स्मरण हो जाते हैं। 48.
 
Upon correct pronunciation of the Omkar in accordance with the rules, the person remembered all the Vedas which he had studied and practised in the past. 48.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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