vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य
»
श्लोक 42
श्लोक
3.85.42
शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मन:।
न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति च कुलं नर:॥ ४२॥
अनुवाद
शरभंग ऋषि और महात्मा शुक के आश्रमों में जाकर मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता और अपने कुल को पवित्र कर लेता है ॥ 42॥
By going to the hermitages of the sage Sharabhang and the great soul Shuka, a man never falls into misfortune and purifies his lineage. ॥ 42॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas