श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 85: गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  3.85.102 
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात्।
महीं विजयते राजा वैश्यो धनमवाप्नुयात्॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
इस महान तीर्थ का पाठ करने से निःसंतान व्यक्ति को पुत्र की प्राप्ति होती है, दरिद्र को धन की प्राप्ति होती है, राजा को इस पृथ्वी पर विजय प्राप्त होती है और वैश्य को व्यापार में धन की प्राप्ति होती है ॥102॥
 
By reciting this great pilgrimage, a childless person gets a son, a poor person gets wealth, a king gains victory on this earth and a Vaishya gets wealth in business. ॥102॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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