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mahabharat 3.83.61-63: महाराज! वहाँ श्वविलोमपहा नामक तीर्थ है। व्याघ्र! तीर्थयात्रा पर गए हुए विद्वान ब्राह्मण उसमें स्नान करके अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भरतशत्तम! श्वविलोमपन्यानतीर्थ में प्राणायाम (योगाभ्यास) करके श्रेष्ठ द्विज अपने केशों को हटा देते हैं और राजेन्द्र! मन को शुद्ध करके वे परम गति को प्राप्त होते हैं। 61-63॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 61-63
 
 
श्लोक  3.83.61-63 
तीर्थं तत्र महाराज श्वाविल्लोमापहं स्मृतम्।
यत्र विप्रा नरव्याघ्र विद्वांसस्तीर्थतत्परा:॥ ६१॥
प्रीतिं गच्छन्ति परमां स्नात्वा भरतसत्तम।
श्वाविल्लोमापनयने तीर्थे भरतसत्तम॥ ६२॥
प्राणायामैर्निर्हरन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमा:।
पूतात्मानश्च राजेन्द्र प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! वहाँ श्वविलोमपहा नामक तीर्थ है। व्याघ्र! तीर्थयात्रा पर गए हुए विद्वान ब्राह्मण उसमें स्नान करके अत्यंत प्रसन्न होते हैं। भरतशत्तम! श्वविलोमपन्यानतीर्थ में प्राणायाम (योगाभ्यास) करके श्रेष्ठ द्विज अपने केशों को हटा देते हैं और राजेन्द्र! मन को शुद्ध करके वे परम गति को प्राप्त होते हैं। 61-63॥
 
Maharaj! There is a pilgrimage site named Shvavillomapaha. Tiger! The learned Brahmins who have gone on pilgrimage are very happy after taking bath in it. Bharatsattam! By doing pranayama (practice of yoga) in Shva-Villomapanyanatirtha, the best Dwijas remove their hair and Rajendra! By being pure in mind, they attain the supreme state. 61-63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)