श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.83.58 
मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भारत।
प्रजा विवर्धते राजन्नतन्वीं श्रियमश्नुते॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
भारतवंशी महाराज! वहाँ मातृतीर्थ है, जिसमें स्नान करने वाले मनुष्य की सन्तान बढ़ती है और वह कभी न घटने वाली सम्पत्ति का भोग करता है।
 
Bharatvanshi Maharaj! There is Matritirtha, in which the progeny of a person who takes bath increases and he enjoys wealth that never diminishes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)