श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 52-53h
 
 
श्लोक  3.83.52-53h 
ततो गच्छेत राजेन्द्र द्वारपालमरन्तुकम्।
तच्च तीर्थं सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मन:॥ ५२॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत्।
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! उसके बाद अरन्तुक नामक द्वारपाल के पास जाओ। महात्मा यक्षराज कुबेर का तीर्थ सरस्वती नदी में है। राजन्! वहाँ स्नान करने से अग्निष्टोमयज्ञ का फल प्राप्त होता है। 52 1/2॥
 
Rajendra! After that go to the gatekeeper named Arantuk. The shrine of Mahatma Yaksharaj Kuber is in the Saraswati river. Rajan! By taking bath there, one gets the results of Agnishtomayagya. 52 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)