श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  3.83.34-35 
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं रामस्य पितरस्तदा॥ ३४॥
प्रत्यूचु: परमप्रीता रामं हर्षसमन्विता:।
तपस्ते वर्धतां भूय: पितृभक्त्या विशेषत:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
परशुराम के ये शुभ वचन सुनकर उनके पितर बहुत प्रसन्न हुए और हर्षित होकर बोले, 'पुत्र! पितरों के प्रति इस विशेष भक्ति के कारण तुम्हारा तप पुनः बढ़े।
 
On hearing these auspicious words of Parasurama, his ancestors became very pleased and said with joy, 'Son! May your penance increase once again due to this special devotion towards your ancestors.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)