श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  3.83.33-34h 
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया।
ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसाप्यहम्॥ ३३॥
ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुता:।
 
 
अनुवाद
'आपके प्रभाव से मैंने क्रोधवश सम्पूर्ण क्षत्रिय कुल का नाश कर दिया है, उस पाप से मैं मुक्त हो जाऊँ तथा मेरे ये सरोवर संसार में प्रसिद्ध तीर्थस्थान बन जाएँ । 33 1/2॥
 
'With your influence, I have destroyed the entire Kshatriya clan due to anger, may I be freed from that sin and may these ponds of mine become famous places of pilgrimage in the world. 33 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)