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mahabharat 3.83.24-26h: भरतश्रेष्ठ! वह कुरुक्षेत्र का प्रसिद्ध द्वार है। उसकी परिक्रमा करके तीर्थयात्री को एकाग्रचित्त होकर पुष्कर तीर्थ के समान उस स्थान में स्नान करना चाहिए तथा देवताओं और पितरों का पूजन करना चाहिए। राजन! इससे तीर्थयात्री कृतार्थ होता है और अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है। महात्मा जमदग्निनन्दन परशुराम ने उस तीर्थ का निर्माण किया है। 24-25 1/2   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 24-26h
 
 
श्लोक  3.83.24-26h 
कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं भरतर्षभ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य तीर्थसेवी समाहित:॥ २४॥
सम्मितं पुष्कराणां च स्नात्वार्च्य पितृदेवता:।
जामदग्न्येन रामेण कृतं तत् सुमहात्मना॥ २५॥
कृतकृत्यो भवेद् राजन्नश्वमेधं च विन्दति।
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! वह कुरुक्षेत्र का प्रसिद्ध द्वार है। उसकी परिक्रमा करके तीर्थयात्री को एकाग्रचित्त होकर पुष्कर तीर्थ के समान उस स्थान में स्नान करना चाहिए तथा देवताओं और पितरों का पूजन करना चाहिए। राजन! इससे तीर्थयात्री कृतार्थ होता है और अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त करता है। महात्मा जमदग्निनन्दन परशुराम ने उस तीर्थ का निर्माण किया है। 24-25 1/2
 
Bharatshrestha! That is the famous gate of Kurukshetra. After circumambulating it, the pilgrim should concentrate and take bath in that place like Pushkar Tirtha and worship the gods and ancestors. Rajan! By this the pilgrim becomes grateful and gets the fruits of Ashvamedhyayagya. The great Mahatma Jamadagninandan Parshuram has built that pilgrimage. 24-25 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)