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mahabharat 3.83.205-206h: एक बार भी यह कहने से कि ‘मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, मैं कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा’, मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 205-206h
 
 
श्लोक  3.83.205-206h 
कुरुक्षेत्रे गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्॥ २०५॥
अप्येकां वाचमुत्सृज्य सर्वपापै: प्रमुच्यते।
 
 
अनुवाद
एक बार भी यह कहने से कि ‘मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, मैं कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा’, मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
 
By saying even once, 'I will go to Kurukshetra, I will reside in Kurukshetra', a person becomes free from all sins. 205 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)