श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  3.83.20-21 
एकहंसे नर: स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत्॥ २०॥
कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप।
पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेच्च स:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
एकहंस्तितर्थ में स्नान करने से मनुष्य सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है। नरेश्वर! कृतशौचतीर्थ में जाकर तीर्थ की सेवा करने वाला मनुष्य पुण्डरीकायग का फल प्राप्त करता है और पवित्र हो जाता है। 20-21॥
 
By taking bath in Ekahanstirtha, a person gets the fruit of Sahasra Godan. Nareshwar! By going to Kritshauchathirtha, a person serving the pilgrimage gets the fruits of Pundarikayaga and becomes pure. 20-21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)