श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  3.83.132 
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा।
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सह महामुने॥ १३२॥
 
 
अनुवाद
'ब्रह्मन्! मेरे तर्पण से तुम्हारा तप सहस्त्र गुना बढ़ जाए। महामुने! मैं इसी आश्रम में तुम्हारे साथ रहूँगा। 132॥
 
'Brahman! May your penance increase a thousand-fold with my offerings. Mahamune! I will stay with you in this ashram. 132॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)