श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 124-125
 
 
श्लोक  3.83.124-125 
अहं तु विस्मयं विप्र न गच्छामीति पश्य माम्।
एवमुक्त्वा नरश्रेष्ठ महादेवेन धीमता॥ १२४॥
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वाङ्गुष्ठस्ताडितोऽनघ।
ततो भस्म क्षताद् राजन्निर्गतं हिमसंनिभम्॥ १२५॥
 
 
अनुवाद
'हे ब्राह्मण! मुझे यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं हो रहा। मेरी ओर तो देखो।' हे पुरुषश्रेष्ठ! हे निष्पाप राजन! ऐसा कहकर परम बुद्धिमान महादेवजी ने अपनी अँगुली के अग्रभाग से अपने अँगूठे पर प्रहार किया। राजन! उनके प्रहार करने पर उस अँगूठे से बर्फ के समान श्वेत राख गिरने लगी। 124-125।
 
'O Brahmin! I am not surprised to see this. Look at me.' O best of men! O innocent king! Saying this, the most intelligent Mahadevji hit his thumb with the tip of his finger. King! On his hitting, white ashes like snow started falling from that thumb. 124-125.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)