श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 123
 
 
श्लोक  3.83.123 
तं प्रहस्याब्रवीद् देव ऋषिं रागेण मोहितम्॥ १२३॥
 
 
अनुवाद
महर्षि राग से मोहित हो रहे थे। महादेवजी ने उनकी बात सुनी और मुस्कुराते हुए कहा-॥123॥
 
Maharishi was getting fascinated by the raga. Mahadevji heard him and said smilingly -॥123॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)