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mahabharat 3.83.109-110: कुरुश्रेष्ठ! उसके बाद नैमिषकुञ्ज का भ्रमण करो। राजेन्द्र! कहते हैं कि नैमिषारण्य निवासी तपस्वी ऋषि एक बार तीर्थयात्रा करते हुए कुरुक्षेत्र आये थे। भरतश्रेष्ठ! उसी समय उन्होंने सरस्वती कुञ्ज (जिसे नैमिषकुञ्ज भी कहते हैं) का निर्माण किया था। 109-110॥   |   mahabharat अध्याय 3.83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 83: कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 109-110
 
 
श्लोक  3.83.109-110 
ततो नैमिषकुञ्जं च समासाद्य कुरूद्वह।
ऋषय: किल राजेन्द्र नैमिषेयास्तपस्विन:॥ १०९॥
तीर्थयात्रां पुरस्कृत्य कुरुक्षेत्रं गता: पुरा।
तत: कुञ्ज: सरस्वत्या: कृतो भरतसत्तम॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
कुरुश्रेष्ठ! उसके बाद नैमिषकुञ्ज का भ्रमण करो। राजेन्द्र! कहते हैं कि नैमिषारण्य निवासी तपस्वी ऋषि एक बार तीर्थयात्रा करते हुए कुरुक्षेत्र आये थे। भरतश्रेष्ठ! उसी समय उन्होंने सरस्वती कुञ्ज (जिसे नैमिषकुञ्ज भी कहते हैं) का निर्माण किया था। 109-110॥
 
Kurushrestha! After that visit Naimishkunj. Rajendra! It is said that the ascetic sage resident of Naimisharanya had once visited Kurukshetra on a pilgrimage. Bharatshrestha! At the same time he constructed Saraswati Kunj (which is also called Naimish Kunj). 109-110॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)