श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.72.5 
नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्ट: पटस्तव।
योजनं समतिक्रान्तो नाहर्तुं शक्यते पुन:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर नल ने उनसे कहा - 'महाराज! आपके वस्त्र बहुत दूर गिर गए हैं। मैं उस स्थान से चार कोस आगे आ गया हूँ। अब उन्हें वापस नहीं लाया जा सकता।'
 
Hearing this, Nala replied to him - 'Maharaj! Your clothes have fallen very far away. I have come four Kos ahead from that place. Now it cannot be brought back.'
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas