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श्लोक 3.72.41-42  |
बिभीतकश्चाप्रशस्त: संवृत्त: कलिसंश्रयात्।
हयोत्तमानुत्पततो द्विजानिव पुन: पुन:॥ ४१॥
नल: संचोदयामास प्रहृष्टेनान्तरात्मना।
विदर्भाभिमुखो राजा प्रययौ स महायशा:॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| कलियुग में आश्रय लेने के कारण बहेड़ा वृक्ष की बड़ी बदनामी हुई । तत्पश्चात राजा नल प्रसन्न मन से पुनः घोड़ों को हांकने लगे । वे उत्तम घोड़े पक्षियों के समान बारंबार उड़ते हुए प्रतीत होने लगे । अब परम यशस्वी राजा नल विदर्भ देश की ओर (अत्यंत वेग से) जा रहे थे ॥ 41-42॥ |
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| The Baheda tree was defamed for taking shelter in Kaliyug. Thereafter King Nala started driving the horses again with a happy heart. Those excellent horses seemed to be flying again and again like birds. Now the highly renowned King Nala was going towards Vidarbha country (moved with great speed). ॥ 41-42॥ |
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