श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.72.35 
अवसं त्वयि राजेन्द्र सुदु:खमपराजित।
विषेण नागराजस्य दह्यमानो दिवानिशम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! मैं आपके शरीर में महान कष्ट सहते हुए रहता था। मैं दिन-रात कर्कोटक नाग के विष से जलता रहता था (इस प्रकार मुझे अपने कर्मों का कठोर दण्ड मिला है)॥35॥
 
'O King who cannot be defeated by anyone! I lived in your body in great pain. I was burning day and night with the poison of the serpent king Karkotaka (thus I have received a severe punishment for my deeds).॥ 35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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