श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.72.34 
इन्द्रसेनस्य जननी कुपिता माशपत् पुरा।
यदा त्वया परित्यक्ता ततोऽहं भृशपीडित:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'जब इंद्रसेन की माता दमयंती ने पहले उसे वन में त्याग दिया था, तब क्रोधित होकर मुझे शाप दिया था। उसी के कारण मैं बहुत दुःख भोग रहा हूँ॥ 34॥
 
'When Damayanti, the mother of Indrasen, had abandoned him in the forest earlier, became angry and cursed me. Because of that I have been suffering a lot.॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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