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श्लोक 3.72.34  |
इन्द्रसेनस्य जननी कुपिता माशपत् पुरा।
यदा त्वया परित्यक्ता ततोऽहं भृशपीडित:॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| 'जब इंद्रसेन की माता दमयंती ने पहले उसे वन में त्याग दिया था, तब क्रोधित होकर मुझे शाप दिया था। उसी के कारण मैं बहुत दुःख भोग रहा हूँ॥ 34॥ |
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| 'When Damayanti, the mother of Indrasen, had abandoned him in the forest earlier, became angry and cursed me. Because of that I have been suffering a lot.॥ 34॥ |
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