श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.72.27 
बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मम।
मत्तोऽपि चाश्वहृदयं गृहाण पुरुषर्षभ॥ २७॥
 
 
अनुवाद
बाहुक ने कहा, 'हे पुरुषश्रेष्ठ! मुझे यह विद्या सिखाइए और बदले में मुझसे अश्वविद्या का रहस्य ले लीजिए।'
 
Bahuka said, 'O best of men! Teach me this knowledge and in return take from me the secret of horse-knowledge.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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