श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.72.18 
अब्रवीदृतुपर्णस्तु सान्त्वयन् कुरुनन्दन।
त्वमेव यन्ता नान्योऽस्ति पृथिव्यामपि बाहुक॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! तब ऋतुपर्ण ने उसे सांत्वना देते हुए कहा- 'बाहुक! इन घोड़ों को केवल तुम ही हांक सकते हो। इस कला में पृथ्वी पर तुम्हारे समान कोई दूसरा नहीं है।'
 
O son of Kuru! Then Rituparna consoled him and said- 'Bahuk! Only you can drive these horses. There is no one else like you on earth in this art.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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