श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 72: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.72.16-17 
तमब्रवीन्नृप: सूतं नायं कालो विलम्बितुम्।
बाहुकस्त्वब्रवीदेनं परं यत्नं समास्थित:॥ १६॥
प्रतीक्षस्व मुहूर्तं त्वमथवा त्वरते भवान्।
एष याति शिव: पन्था याहि वार्ष्णेयसारथि:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तब राजा ने सारथि से कहा, 'यह विलम्ब करने का समय नहीं है।' बाहुक बोला, 'मैं प्रयत्न करके शीघ्र ही गणना पूरी कर लूँगा। तुम केवल दो मिनट रुको। अथवा यदि तुम्हें शीघ्रता हो, तो विदर्भ जाने का यह शुभ मार्ग है, वार्ष्णेय को सारथि बनाकर चले जाओ।'॥16-17॥
 
Then the king said to the charioteer, 'This is not the time to delay.' Bahuk said, 'I will try and finish the calculation soon. You wait for only two minutes. Or if you are in a hurry, then this is an auspicious route to Vidarbha, take Varshneya as your charioteer and go.'॥ 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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