Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.71.34: महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पुण्यात्मा नल के सारथि वार्ष्णेय ने बार-बार उपर्युक्त रूप का ध्यान करके मन में उपरोक्त धारणा बनाई। | mahabharat अध्याय 3.71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एवं विचार्य बहुशो वार्ष्णेय: पर्यचिन्तयत्।
हृदयेन महाराज पुण्यश्लोकस्य सारथि:॥ ३४॥
अनुवाद
महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पुण्यात्मा नल के सारथि वार्ष्णेय ने बार-बार उपर्युक्त रूप का ध्यान करके मन में उपरोक्त धारणा बनाई।
Maharaja Yudhisthira! Thus, Varshneya, the charioteer of the virtuous Nal, contemplating the above mentioned form again and again, formed the above belief in his mind.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥