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mahabharat 3.71.22-23: फिर उन्होंने लगाम हाथ में लेकर रथ को आगे बढ़ाने की इच्छा की। उन्होंने सारथी वार्ष्णेय को रथ पर बिठाया और रथ को बड़े वेग से हाँकने लगे। भुजदण्डों द्वारा सुनियोजित ढंग से हाँके जाने वाले वे उत्तम घोड़े सारथी को मोहित करते हुए ऐसे वेग से चलने लगे मानो आकाश में उड़ रहे हों।   |   mahabharat अध्याय 3.71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 71: राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्‍भुत अश्वसंचालनकलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  3.71.22-23 
रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेष स:।
सूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम्॥ २२॥
ते चोद्यमाना विधिवद् बाहुकेन हयोत्तमा:।
समुत्पेतुरथाकाशं रथिनं मोहयन्निव॥ २३॥
 
 
अनुवाद
फिर उन्होंने लगाम हाथ में लेकर रथ को आगे बढ़ाने की इच्छा की। उन्होंने सारथी वार्ष्णेय को रथ पर बिठाया और रथ को बड़े वेग से हाँकने लगे। भुजदण्डों द्वारा सुनियोजित ढंग से हाँके जाने वाले वे उत्तम घोड़े सारथी को मोहित करते हुए ऐसे वेग से चलने लगे मानो आकाश में उड़ रहे हों।
 
Then taking the reins in his hands and controlling them, he desired to move the chariot forward. He seated charioteer Varshneya on the chariot and driving the chariot with great speed. Driven methodically by the arms, those excellent horses moved with such great speed, mesmerizing the charioteer, as if they were flying in the sky.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)