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mahabharat 3.64.23-24: पृथ्वीनाथ! मैं असहाय, दुर्बल, पीला और मलिन हूँ, आधे वस्त्र से शरीर ढके हुए अनाथ की भाँति रो रहा हूँ। हे महाकाय शत्रुसूदन आर्य! मेरी दशा अपने झुंड से बिछड़े हुए हिरण के समान है। मैं यहाँ अकेला रो रहा हूँ। किन्तु आप मेरा सम्मान नहीं करते॥ 23-24॥   |   mahabharat अध्याय 3.64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 64: दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  3.64.23-24 
कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप।
वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत्॥ २३॥
यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन।
न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन॥ २४॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! मैं असहाय, दुर्बल, पीला और मलिन हूँ, आधे वस्त्र से शरीर ढके हुए अनाथ की भाँति रो रहा हूँ। हे महाकाय शत्रुसूदन आर्य! मेरी दशा अपने झुंड से बिछड़े हुए हिरण के समान है। मैं यहाँ अकेला रो रहा हूँ। किन्तु आप मेरा सम्मान नहीं करते॥ 23-24॥
 
Prithvinath! I am helpless, weak, pale and dirty, covering my body with half clothes and crying like an orphan. O great-eyed Shatrusudan Arya! My condition is like that of a deer separated from its herd. I am crying here alone. But you do not respect me.॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)