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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश
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श्लोक 3
श्लोक
3.63.3
हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन् किं जहासि माम्।
हा हतास्मि विनष्टास्मि भीतास्मि विजने वने॥ ३॥
अनुवाद
'हे प्रभु! हे राजन! हे प्रभु! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? हाय! मैं मारा गया, नष्ट हो गया; इस निर्जन वन में मुझे बहुत भय लग रहा है।
'Oh Lord! Oh King! Oh Lord! Why are you abandoning me? Alas! I am killed, destroyed; I am feeling very afraid in this deserted forest.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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