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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.63.23 
हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत्।
ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि॥ २३॥
 
 
अनुवाद
(वह रोते हुए कहने लगी-) 'हे प्रभु! इस निर्जन वन में यह अजगर सर्प मुझे अनाथ की भाँति खा रहा है। आप दौड़कर मुझे क्यों नहीं बचाते?॥ 23॥
 
(She started crying and said-) 'Oh Lord! In this deserted forest this python snake is devouring me like an orphan. Why don't you come running to save me?॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)