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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 63: दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.63.10 
नृशंसं बत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह।
विलपन्तीं समागम्य नाश्वासयसि पार्थिव॥ १०॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! मैं यहाँ इतने डर और चिंता में रो रही हूँ और आप मुझे आश्वासन देने तक नहीं आते! महाराज! यह आपकी बड़ी क्रूरता है।
 
Rajendra! I am crying here in such fear and worry and you do not even come to assure me! King! This is very cruel of you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)