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श्लोक 3.62.10  |
किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वत:।
किं नु मे मरणं श्रेय: परित्यागो जनस्य वा॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| वह सोचने लगा, 'ऐसा करने से मेरा क्या होगा और ऐसा न करने से मेरा क्या होगा? अपनी प्रियतमा दमयन्ती को त्यागने से तो मेरा मर जाना ही अच्छा है॥10॥ |
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| He began to think, 'What will happen to me if I do this and what will happen if I don't do this. It is better for me to die than to abandon my beloved Damayanti.॥10॥ |
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