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mahabharat 3.57.5: जैसे बाघों से भरी हुई पर्वत गुफा और सर्पों से सुशोभित भोगवती पुरी हो, वैसे ही वह पुण्यमय राजसभा श्रेष्ठ मानव सेवकों से भरी हुई प्रतीत होती थी॥5॥   |   mahabharat अध्याय 3.57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.57.5 
तां राजसमितिं पुण्यां नागैर्भोगवतीमिव।
सम्पूर्णां पुरुषव्याघ्रैर्व्याघ्रैर्गिरिगुहामिव॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जैसे बाघों से भरी हुई पर्वत गुफा और सर्पों से सुशोभित भोगवती पुरी हो, वैसे ही वह पुण्यमय राजसभा श्रेष्ठ मानव सेवकों से भरी हुई प्रतीत होती थी॥5॥
 
Like a mountain cave filled with tigers and Bhogwati Puri decorated with snakes, that virtuous royal court appeared to be filled with the best of human servants. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)