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mahabharat 3.57.36-37h: अग्निदेव ने, जो हवि के भोक्ता थे, नल को अपने समान ही तेजस्वी लोक प्रदान किया और कहा, 'राजा नल जहाँ भी चाहेंगे, मैं वहाँ प्रकट हो जाऊँगा।'   |   mahabharat अध्याय 3.57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 57: स्वयंवरमें दमयन्तीद्वारा नलका वरण, देवताओंका नलको वर देना, देवताओं और राजाओंका प्रस्थान, नल-दमयन्तीका विवाह एवं नलका यज्ञानुष्ठान और संतानोत्पादन  »  श्लोक 36-37h
 
 
श्लोक  3.57.36-37h 
अग्निरात्मभवं प्रादाद् यत्र वाञ्छति नैषध:॥ ३६॥
लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशन:।
 
 
अनुवाद
अग्निदेव ने, जो हवि के भोक्ता थे, नल को अपने समान ही तेजस्वी लोक प्रदान किया और कहा, 'राजा नल जहाँ भी चाहेंगे, मैं वहाँ प्रकट हो जाऊँगा।'
 
The god Agni, the consumer of offerings, bestowed upon Nala a world as splendid as his own and also said, 'I shall appear wherever King Nala wishes.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)