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mahabharat 3.55.17: वह सोचने लगी, 'ओह! इसका सौन्दर्य अद्भुत है, इसकी प्रभा अत्यन्त मनमोहक है और इस महात्मा का धैर्य भी अद्वितीय है। मैं सोचती हूँ कि यह कौन है? सम्भव है कि यह कोई देवता, यक्ष या गन्धर्व हो।'॥17॥   |   mahabharat अध्याय 3.55: नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 55: नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.55.17 
अहो रूपमहो कान्तिरहो धैर्यं महात्मन:।
कोऽयं देवोऽथवा यक्षो गन्धर्वो वा भविष्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वह सोचने लगी, 'ओह! इसका सौन्दर्य अद्भुत है, इसकी प्रभा अत्यन्त मनमोहक है और इस महात्मा का धैर्य भी अद्वितीय है। मैं सोचती हूँ कि यह कौन है? सम्भव है कि यह कोई देवता, यक्ष या गन्धर्व हो।'॥17॥
 
She started thinking, 'Oh! His beauty is wonderful, his radiance is very charming and the patience of this great soul is also unique. I wonder who he is? It is possible that he is a god, a Yaksh or a Gandharva.'॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)