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श्लोक  3.52.36 
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणं भीमं तु धर्मराजो युधिष्ठिर:।
उवाच सान्त्वयन् राजा मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! उपर्युक्त बातें कहने वाले धर्मराज युधिष्ठिर ने पाण्डुनन्दन भीमसेन का सिर सूँघकर उन्हें सान्त्वना दी और कहा - 36॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Dharamrajraja Yudhishthir, who said the above mentioned things, smelled the head of Pandunandan Bhimsen and consoled him and said - 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)