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mahabharat 3.5.14: पाण्डवों! मैंने तुमसे ऐसी बात कही थी जो दोनों पक्षों के लिए परम हितकारी थी, परन्तु अम्बिकानन्दन महाराज धृतराष्ट्र ने मेरी बात नहीं मानी। जैसे रोगी को पौष्टिक भोजन अच्छा नहीं लगता, वैसे ही राजा धृतराष्ट्र को मेरी दी हुई पौष्टिक सलाह भी अच्छी नहीं लगती॥ 14॥   |   mahabharat अध्याय 3.5: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.5.14 
परं श्रेय: पाण्डवेया मयोक्तं
न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेय:।
यथाऽऽतुरस्येव हि पथ्यमन्नं
न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
पाण्डवों! मैंने तुमसे ऐसी बात कही थी जो दोनों पक्षों के लिए परम हितकारी थी, परन्तु अम्बिकानन्दन महाराज धृतराष्ट्र ने मेरी बात नहीं मानी। जैसे रोगी को पौष्टिक भोजन अच्छा नहीं लगता, वैसे ही राजा धृतराष्ट्र को मेरी दी हुई पौष्टिक सलाह भी अच्छी नहीं लगती॥ 14॥
 
Pandavas! I had told you something that would be of utmost benefit to both sides, but Ambikanandan Maharaja Dhritarashtra did not listen to me. Just as a sick person does not like healthy food, similarly King Dhritarashtra does not like even the healthy advice I give.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)