श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 47: लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.47.15 
उद्‍वृत्ता ह्यसुरा: केचिन्निवातकवचा इति।
विप्रियेषु स्थितास्माकं वरदानेन मोहिता:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
'आजकल कुछ निवातकवच नामक राक्षस बड़े उत्पात मचा रहे हैं। वरदानों से मोहित होकर वे हमें हानि पहुँचाने का प्रयत्न कर रहे हैं।॥15॥
 
'These days some demons known as Nivatakavachas are becoming very unruly. Enticed by the boons, they are trying to cause us harm.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)