Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.46.54-55: चित्रसेन ने देवराज इन्द्र को भी सारा वृत्तान्त सुनाया। तब इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन को बुलाकर एकान्त में शुभ वचनों से उसे सान्त्वना दी और मुस्कुराते हुए कहा - 'तात! तुम सत्पुरुषों के शिरोमणि हो, तुम्हारे समान पुत्र पाकर कुन्ती सचमुच ही श्रेष्ठ पुत्र है।'   |   mahabharat अध्याय 3.46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 46: उर्वशीका कामपीड़ित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  3.46.54-55 
अवेदयच्च शक्रस्य चित्रसेनोऽपि सर्वश:।
तत आनाय्य तनयं विविक्ते हरिवाहन:॥ ५४॥
सान्त्वयित्वा शुभैर्वाक्यै: स्मयमानोऽभ्यभाषत।
सुपुत्राद्य पृथा तात त्वया पुत्रेण सत्तम॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
चित्रसेन ने देवराज इन्द्र को भी सारा वृत्तान्त सुनाया। तब इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन को बुलाकर एकान्त में शुभ वचनों से उसे सान्त्वना दी और मुस्कुराते हुए कहा - 'तात! तुम सत्पुरुषों के शिरोमणि हो, तुम्हारे समान पुत्र पाकर कुन्ती सचमुच ही श्रेष्ठ पुत्र है।'
 
Chitrasena also narrated the entire incident to Devraj Indra. Then Indra called his son Arjun and consoled him in private with auspicious words and said to him with a smile - 'Tata! You are the crown of good men, Kunti is truly the best son after having a son like you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)